नवरात्र का चौथा दिन,माँ कुष्मांडा की पूजा,विवाहित को मिलता है विशेष लाभ। - खबरदार जमुई

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Tuesday, October 1, 2019

नवरात्र का चौथा दिन,माँ कुष्मांडा की पूजा,विवाहित को मिलता है विशेष लाभ।

नवरात्र का आज चौथा दिन है। देवीभागवत पुराण के अनुसार इस दिन देवी के चौथे स्वरूप माता कूष्मांडा की पूजा करनी चाहिए। माता का यह स्वरूप देवी पार्वती के विवाह के बाद से लेकर संतान कुमार कार्तिकेय की प्राप्ति के बीच का है। इस रूप में देवी संपूर्ण सृष्टि को धारण करने वाली और उनका पालन करने वाली हैं। संतान की इच्छा रखने वाले लोगों को देवी के इस स्वरूप की पूजा आराधना करनी चाहिए। सांसारिक लोगों यानी घर परिवार चलाने वालों के लिए इस देवी की पूजा बेहद कल्याणकारी है।

ऐसा है मां का स्‍वरूप

मां का यह स्‍वरूप मंद-मंद मुस्‍कुराहट वाला है। कहा जाता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तो देवी भगवती के इसी स्‍वरूप ने मंद-मंद मुस्‍कुराते हुए सृष्टि की रचना की थी। इसीलिए ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा और आदिशक्ति हैं। देवी कूष्‍मांडा का निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में माना गया है। वहां निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल देवी के इसी स्‍वरूप में है। मां के शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान है। देवी कूष्‍मांडा के इस दिन का रंग हरा है। मां के सात हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्‍प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र और गदा है। वहीं आठवें हाथ में जपमाला है, जिसे सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली माना गया है। मां का वाहन सिंह है।

मिट जाते हैं सारे रोग-शोक

देवी कूष्‍मांडा की आराधना करने से आराधकों के सभी रोग-शोकों का नाश हो जाता है। इसके अलावा मां की कृपा से आयु, यश, बल और स्वास्थ्य समृद्धि आती है। जो लोग अक्सर बीमार रहते हैं उन्हें देवी कूष्मांडा की पूजा श्रद्धा भाव सहित करना चाहिए।


मां कूष्‍मांडा आराधना मंत्र

देवी कूष्‍मांडा की कृपा और आशीर्वाद पाने के लिए ‘या देवी सर्वभू‍तेषु कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।’ श्‍लोक का यथाशक्ति जप करें। इससे मां प्रसन्‍न होती हैं और भक्‍त को सुख-समृद्धि और आरोग्‍यता का वर देती हैं।

4/4कूष्मांडा देवी को प्रिय है यह प्रसाद
संस्कृत में कूष्मांड कद्दू और कुम्हरे को कहा जाता है जिससे पेठा तैयार किया जाता है। इस ब्रह्माण्ड को कुम्हरे से समान माना गया है जो बीच में खाली होता है और इसके चारों तरफ एक आवरण होता है। देवी ब्रह्माण्ड के मध्य में निवास करती हैं और सभी जीवों का संरक्षण करती है। इनको कुम्हरे की बलि सबसे प्रिय है। कुम्हरे से बना पेठा भी देवी का पसंद है इसलिए इन्हें प्रसाद स्वरूप पेठे का भोग लगाना चाहिए

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