कन्हैया के समर्थन में कौन है!अगर जीत भी गए तो क्या होगा! - खबरदार जमुई

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Thursday, April 18, 2019

कन्हैया के समर्थन में कौन है!अगर जीत भी गए तो क्या होगा!


कन्हैया कुमार को वे ही लोग ज्यादा पसंद कर रहे हैं जो मोदी और भाजपा को नापसंद करते हैं. कन्हैया जिस पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं उसका वजूद तो मिटता जा रहा है. एक बार देखिये तो सही कि कम्युनिस्ट पार्टी का क्या हश्र है देश में. कन्हैया को जीताने के पीछे लोगों का तर्क यह भी है कि जब ये जेएनयू नेता संसद में पहुंचेगा तो भाषण में मोदी को टक्कर देगा. सदन में कोई ऐसा नेता होना चाहिए जो मोदी को भाषण में दाब सके. दरअसल, हमारे देश में लोगों को दो पक्षों के बीच लड़ाई देखने में बड़ा आनंद आता है. हमें इसमें मदारी वाला फील आता है. लड़ाई चाहे जुबान की हो या शारीरिक. हम देश के लोग मुर्गा लड़ाई में भी आनंद ढूंढ लेते हैं. फर्ज कीजिए कन्हैया कुमार चुनाव जीतकर सदन में चले भी गए तो क्या हो जाएगा? 

अगर कन्हैया को आप बस इसलिए जीतता देखना चाहते हैं कि वह सदन में जाकर मुंहगोले दागेंगे? फिर तो इसके लिए कई और नेता मौजूद हैं संसद में. ओवैसी भी तो अच्छा बोल लेते हैं. बीजेपी में भी कई नेता हैं जो अच्छी तकरीर कर लेते हैं. इसके अलावा विपक्ष के नेता भी भाषण में अच्छा तीर छोड़ लेते हैं. फिर आप कन्हैया को क्यों जीता रहे हैं? क्या आपके भीतर फिर से राजनीति सुचिता कि भावना तो उबाल नहीं मार रही कि अगर कन्हैया जीत गए तो राजनीति साफ़ सुथरी हो जाएगी, बिलकुल बदल जाएगी जैसा आप सियासत को लेकर बदलाव चाहते हैं वैसी हो जाएगी? अगर ऐसा है तो आपके सामने केजरीवाल अच्छे उदहारण हैं जो राजनीति बदलने चले थे लेकिन खुद ही बार बार बदलते गए? 

तो सियासत में अब कभी सुचिता की बात वगेराह मत सोचियेगा? क्योंकि वर्षों बाद 'आप' के रूप में एक पार्टी से लोगों को बहुत उम्मीदें थी लेकिन वह भी बाकियों के तरह ही निकली. दरअसल, कहते हैं न कि ये काजल की कोठरी है और जो इसमें घुसेगा उसे कालिख लगनी ही है. 

दरअसल, कन्हैया जिस सोच के साथ जी रहे हैं वो देश के लिए बहुत खतरनाक है. 'हम लेकर रहेंगे आजादी'. कैसी आजादी? अब तक आजाद नहीं थे? सही मायनों में तो इस देश में जितनी आजादी है उतनी किसी और देश में नहीं मिलेगी. आप पीएम से लेकर सीएम तक को गरिया लेते हैं और मस्त रहते हैं? अगर आजादी की बात है तो एक बार सोचियेगा जरूर कि आपको इस देश में दूसरे देश से क्या अलग मिला है? 

उमर खालिद, शहला राशिद और कन्हैया कुमार को आजादी की बड़ी फ़िक्र है? शहला दिल्ली में रहती हैं तो छोटे कपड़े में घूमती हैं लेकिन वही शहला जब कश्मीर में शाह फैसल की पार्टी की लाँचिंग में जाती हैं तो पूरे बदन को ढक लेती हैं. अब तो शेहला को बताना चाहिए कि आजादी ज्यादा दिल्ली में है या कश्मीर में. 

कन्हैया, शहला, उमर खालिद जैसे लोग इस देश के लिए खतरनाक हैं. उनकी सोच खतरनाक है. चुनाव में कन्हैया के लिए जनता का जो फैसला होगा वो मंजूर है. लेकिन मैं कन्हैया को एक सांसद के तौर पर नहीं देखना चाहता.

लेखक नितेश त्रिपाठी जी दिल्ली में पत्रकार हैं।

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