साध्वी का श्राप या हेमंत की शहादत! - खबरदार जमुई

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Monday, April 22, 2019

साध्वी का श्राप या हेमंत की शहादत!


...तो एक साध्वी के श्राप ने हेमंत करकरे को मौत की नींद सुला दिया! यह देश साधु-संतों के मामले में धनवान है. एक साध्वी ने श्राप दिया और एक पुलिस अधिकारी शहीद नहीं हुआ बल्कि मारा गया. आंसू भी छलक आये. अरे भईया, हमने तो सुना था कि जब-जब पछुआ हवा चलती है तो पुराना दर्द उभर आता है. लेकिन लगता है कि अब कहावतें बदल रही हैं. अब तो यही लगता है कि जब जब चुनाव का मौसम आता है पुराने दर्द छलक आते हैं. आंखों में आंसू आ जाते हैं और पुलिस के टॉर्चर याद आने लगते हैं. तकलीफों को नकारा नहीं जा सकता. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि इन सबका इस्तेमाल आप राजनीति का स्तर गिराने के लिये करने लगें. इसका मतलब यह नहीं कि आप एक शहीद अधिकारी के लिये, अपने श्राप को जिम्मेदार ठहराने लगें. राजनीति अपनी जगह होनी चाहिये और आरोप-प्रत्यारोप का गिरा स्तर अपनी जगह.

पिछले कुछ दिनों के दौरान राजनीति में बयानबाजी का स्तर जिस कदर गिरा है वह शेयर बाजार को भी मात देता नजर आता है. राजनीति में एक शुचिता रहनी चाहिये. पद और बयानों की गरिमा बनी रहनी चाहिये. चुनाव आएंगे और चले जाएंगे. नयी सरकार भी बन जाएगी. लेकिन लोकतंत्र के मंदिर में जो प्रतिध्वनियां सुनाई देती रहेंगी वो हमें टीसती रहेंगी.

वोटों के लिये उनका दर्द भी नहीं भूलिए जिन्होंने ब्लास्ट में अपनों को खोया है. जिन्होंने अपनी जान की कुर्बानी देकर आतंकियों से लोहा लिया. आपने एक श्राप दे दिया और पुलिस अधिकारी मारा गया! अगर आपके श्राप में इतनी ही ताकत है तो देश में इतनी समस्याएं हैं, इतने दुश्मन हैं सभी को श्राप दे दीजिए. खत्म हो जाएंगी समस्याएं. अपनी देशभक्ति का सबूत दीजिए ना कि शहीद की देशभक्ति पर सवाल उठाइए. बोलने से पहले इतना तो सोचा होता कि शहीद करकरे की पत्नी पर क्या गुजरेगी, उनके बच्चों पर क्या गुजरेगी? खैर चलिये, आपसे समझदारी की उम्मीद करना ही बेमानी है. राजनीति के वर्तमान हालात में वोट के लिये कुछ भी संभव है. यहां आंसुओं के लिये भी वोट तय होते हैं. बटोरिये जितना बटोरना हो, जैसे बटोरना हो. यहां के मतदाताओं को भी ऐसे ही मसाले चाहिये. विकास, रोजी-रोजगार से उन्हें कोई वास्ता नहीं. वास्ता होता तो तस्वीर ही कुछ और होती. चलिए लोकतंत्र की जय बोलिए और देखते जाइए कि आगे-आगे होता है क्या.

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