मिलिए भारत के पहले मतदाता से,104 साल उम्र में भी है युवा जोश।क्या कहता है इनका मिज़ाज। - खबरदार जमुई

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Monday, April 8, 2019

मिलिए भारत के पहले मतदाता से,104 साल उम्र में भी है युवा जोश।क्या कहता है इनका मिज़ाज।


चुनावी माहौल में वोटों की सरगर्मियां सर चढ़ कर बोल रही है,
हर पार्टी का अपना एजेंडा है और अलग अलग मुद्दों पर जीत का सेहरा बांधने का दावा।
हर पार्टी का नज़र उनका वोट बैंक है, कहीं दलित कार्ड फेंककर तो कहीं सवर्णों को अपनी राजनीतिक जाल में पात कर,और कहें तो जातिगत समीकरण को टारगेट कर सब अपना टारगेट ऑडियंस फिट कर किये ताकि इस चुनावी मौसम में वो अपने वोट बैंक से हिट हो सकें।
लेकिन एक ऑडियंस ऐसा भी है जिसपर किसी की निगाहें नहीं जाती हैं।चाहे पार्टी के अंदर के आडवाणी हो या घर में अपने उम्र के अंतिम दिन में कोई आम नागरिक।
जी हाँ हम बात कर रहे हैं बुजुर्गों की तो आज हम ऐसे ही एक बुजुर्ग की बात कर रहे हैं जो भारत के पहले मतदाताओं में हैं।जिन्होंने भारत के उस दौर को भी देखा है जब राज अंग्रेजों का था और उस दिन के भी उदाहरण हैं जब राजनीति में कांग्रेस का एकतरफा राज हुआ करता था और आज भी उस दौर के साक्षी हैं जब हुकूमत की डोर भाजपा के हाथों में है।
ऐसे ही शख्स से आज हम आपको रूबरू कराने जा रहें हैं हमारी खास पेशकश ख़बरदार वोटर में।
आज हम जिस शख्स की बात कर रहें हैं उनका नाम है अधिकलाल राजहंस जिनकी उम्र 104 साल है और इसबार को लगातार 17वीं लोकसभा का हिस्सा होंगे।आइये उनके मन की बात जानते हैं-
अधिकलाल राजहंस जो कि इस बार 104 साल के हो जाएंगे क्या उनका मन ढलते उम्र और बढ़ते दौर के साथ क्या बदल पाया है-
अक्सर जब किसी बुजुर्गों से बात होती है तो पार्टी के नाम पर उनके जहन में कांग्रेस का ही नाम पहले होता है।लेकिन इस बार वयोवृद्ध नेत्रहीन अधिकलाल राजहंस जी ने अपना मन कुछ बदल लिया है और वोटर के रुप में अपना वोट बीजेपी को देने के पक्ष में है।हालांकि वो इस बात से भी नहीं मुकरते की कांग्रेस के पक्षधर नहीं हैं।चाहे दिल की ही मजबूरी क्यों न हो वोट हमेशा सोच समझ कर डालते हैं।

विनिंग कैंडिडेट को ही करते हैं वोट, अंतिम समय में पूछ कर करते हैं फैसला-
बातचीत के क्रम में ये भी पता चला कि चुनावी हवा को भांपते हुए ही हर किसी को वोट करना चाहिए साथ ही वैसे प्रत्याशी को वोट करना चाहिए जो हर मायने में ईमानदार और जनता के लिए काम करने वाला हो और जीतने का मादा भी रखता हो।वे युवाओं से अपील करते हुए कहते हैं कि मतदान ज़रूर करें और अपना वोट को व्यर्थ न जानें दें।हालाँकि आपको बता दूं कि श्री अधिकलाल राजहंस की उम्र 104 साल हैं और करीब 30 सालों से नेत्रहीन हैं।फिर भी वे वोट करने अवश्य जाते हैं ऐसे में वे उस आदमी के मतपर भी विश्वास करते हैं जो वोट देने ले जाते हैं।

मोदी से नहीं नितीश हैं वोट फैक्टर-
वे बताते हैं कि मोदी क्या कर रहे हैं या नहीं इससे ज्यादा कहीं मायने नितीश के कार्यों को देखना दिलचस्प है।अगर नीतीश बीजेपी में शामिल नहीं होते और अन्य किसी पार्टी में शामिल होते तो वोट इधर उधर हो सकता था लेकिन नितीश का कार्यकाल अबतक ठीक रहा है और यही कारण है कि बीजेपी का साथ उन्हें पसन्द है।और वोट बीजेपी के पक्ष में जाता नज़र आ रहा है।

मोदी की सराहना,बोले अच्छे काम से ही नेता जीतता है।आधारकार्ड को बताया आहत करने वाला स्कीम-

कुछ कामों को छोड़ दिया जाए तो प्रधानमंत्री आवास योजना,आयुष्मान भारत,उज्जवला योजना,स्वच्छता मिशन के साथ साथ शौचालय योजना से लोग काफी प्रभावित हैं और इन कार्यों के बदौलत ही मोदी ने एक अलग पहचान बनाई है।वहीं नोटबन्दी और आधारकार्ड को हर चीज से लिंक कराने की बात पर व्व नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि बुढ़ापे में उंगलियों के निशान और रेटिना का सही से काम न करना लाजमी है और जहाँ आधारकार्ड के बिना कोई कार्य नहीं हो सकता वैसी योजनाओं से हम वृद्धों को बहुत नुकसान हुआ है जो आहत करने वाली है।

जमुई के प्रत्याशी में कोई नहीं है पसन्द-
जहां बात की जाय जमुई के प्रत्याशियों की तो इनको कोई भी प्रत्याशी अबतक पसन्द नहीं आया है जो कि जमुई के समुचित विकास को लेकर दृढ़संकल्प हो सके और जमुई को आगे बढ़ा सके।
जहाँ तक बात भूदेव चौधरी और चिराग पासवान की है तो भूदेव पसन्द की स्थिति में कतई नहीं है वज़ह पूछने पर पता चला कि बहुत कम ऐसे हैं जिन्हें यह पता होगा कि भूदेव जमुई के सांसद भी रह चुके हैं।ऐसे निष्क्रिय प्रत्यासी को पुनः मौका देकर क्या फायदा जो गायब ही रहें।

वृद्धों की मतदाताओं में घटती पूछ से हैं नाराजगी-
इनके बातों से लगता है कि वे कहीं न कहीं आहत हैं और निष्क्रिय मतदाता की श्रेणी में अपने जैसे वृद्धों को जोड़ लिया है।कारण पूछने पर बताते हैं कि एक समय था जब घर आकर नेता बुजुर्गों से मिलते थे बात होती थी और समस्या पर गौर करते थे लेकिन अब उनका एक सीमित वोट बैंक है और सीमित लोगों से मुलाकात होती है।जो हम जैसे वृद्धों की पूछ कम कर रही है और आहत करने वाली है।

बदल गया है प्रचारतंत्र, बदली है जनता.
एक समय था जब बड़ी बड़ी गाड़ियों का काफिला और कच्ची सड़क पर उड़ते धूल को देख कर पता लग जाता था कि चुनावी मौसम आ गया है अब को दौर देखने को नहीं मिलता
है साथ ही पहले हर प्रत्याशी का अपना वोट बैंक होता था जो खुलकर सामने आता था लेकिन समय के साथ मतदाताओं में जागरूकता आयी है और लोकतंत्र में चुनाव की  समझदारी बढ़ी है अब युवावर्ग सोच समझकर अपना मतदान करते हैं।

अबतक के लिए इतना ही आगे की मुलाकात कहीं और से किसी और से देश के पहले मतदाता के साथ हम कराते रहेंगे।
रवि मिश्र



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