क्या नेहरू पर मरणोपरांत देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए! - खबरदार जमुई

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Friday, February 8, 2019

क्या नेहरू पर मरणोपरांत देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए!


26 जनवरी 1950 को भारत गणतांत्रिक भारत बना और इससे कुछ माह पहले 21 सितंबर 1949 को चीन जनवादी चीन बना। इसे पहले दोनों देश राजनीतिक उथल-पुथल से गुजरे। चीन में करीब 3 दशक तक गृहयुद्ध जैसी स्थिति रही जिसमें माओ के नेतृत्व में एक दल की तानाशाही वाले कम्युनिस्टों की जीत हुई और च्यांग काई शेक के नेतृत्व वाले कथित राष्ट्रवादियों को धकेल कर ताईवान तक सीमित कर दिया गया।

ऐसे ही भारत में लीगी मुसलमानों ने हिन्दुओं को साथ रहने से इंकार करते हुए अलग इस्लामिक देश का मांग कर दी। 10 लाखों लोगों के नरसंहार के बाद एक नया देश पाकिस्तान बनकर दुनिया के नक्शे में सामने आया। भारत जिसने यहुदी देश के तौर पर इजरायल को मान्यता देने में चार दशक लगा दिए इस्लामिक देश के तौर पर पाकिस्तान और कम्युनिस्ट देश के तौर पर चीन को मान्यता देने वाला प्रथम देश (पहले गैर कम्युनिस्ट देश) बना।

उस समय यूएन की सुरक्षा परिषद की चार सीटों पर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस थे पांचवी सीट खाली थी। पश्चिम चाहता था ये सीट चीन को ना मिले वरना दो कम्युनिस्ट देश सुरक्षा परिषद में आ जाएंगे तो उसने मामला उलझाए रखने के लिए ताईवान (राष्ट्रवादी चीन) को चीन के तौर पर मान्यता दे देकर सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बना दिया। लेकिन ये ज्यादा दिन चलने वाला नहीं था तो अमेरिका ने भारत को सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट लेने का प्रस्ताव दिया लेकिन पं नेहरू ने साफ मना कर दिया उन्होंने कहा पहला हक चीन का बनता है हमें नहीं चाहिए। 

1953 में स्टालिन के मौत के बाद माओ अपने आप को सबसे सीनियर वैश्विक कम्युनिस्ट नेता मानने लगे जिससे चीन और रूस के संबंध खराब होते गए और 1950 के दशक के अंत तक दोनों देशों के बीच में युद्ध तक छिड़ गया। चीन से खराब होते संबंधों के बीच रूस ने भारत को सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट ऑफर की ताकि चीन उस पर ना बैठे लेकिन पं. नेहरू ने एक बार ऑफर ठुकरा दिया। यहां तक की रूस ने भारत के लिए छठी सीट बनाने तक की बात की लेकिन नेहरू ने कहा पहले चीन का मसला हल होना चाहिए फिर हम सोचेंगे। इस तरह गोवा या दिल्ली जितना बड़ा देश ताईवान 1971 तक सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बना रहा और थक कर अंत में 1971 में चीन को सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता दे दी गई। 

भारत आज  कम से कम छह दशकों से सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होता. हिंदी तब अपने आप संयुक्त राष्ट्र की एक आधिकारिक भाषा बन गयी होती। भारत की ही नहीं, हिंदी की भी तब दुनिया भर में वैसी ही पूछताछ हो रही होती, जैसी आज चीन की और चीनी भाषा की है। कहने की आवश्यकता नहीं कि 1950 वाले दशक जैसा सुनहरा मौका न तो भारत के लिए और न हिंदी के लिए दुबारा आयेगा।

हमें वीटों का अधिकार नहीं मिला, हम विश्व शक्ति नहीं बन पाए, हिन्दी विश्व भाषा नहीं बन पाई, कश्मीर मामले का हल नहीं हो पाया, ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि पं. नेहरू को चीन में दोस्त नज़र आता था वो भी ऐसा जिसके लिए अपने थाली की रोटी दे दिए जाए।

सही मायनों में अकेले इस मुद्दे पर ही पं नेहरू पर मरणोपरांत देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए।
#लेखक अविनाश त्रिपाठी एक पत्रकार हैं और साथ ही ये उनकी अपनी अभिव्यक्ति है।

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