सरस्वती की स्मृतियां !आईपीएस ध्रुवगुप्त - खबरदार जमुई

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Sunday, February 10, 2019

सरस्वती की स्मृतियां !आईपीएस ध्रुवगुप्त


सरस्वती कोई काल्पनिक देवी नहीं,  प्राचीन सरस्वती नदी का मानवीकरण और वैदिक भारत में विद्या, बुद्धि, साहित्य और संगीत के क्षेत्र में इसकी भूमिका का सम्मान है। कभी प्राचीन आर्य सभ्यता और संस्कृति का केंद्र उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत हुआ करता था। आज की विलुप्त सरस्वती तब इस क्षेत्र की मुख्य नदी हुआ करती थी जिसे सदानीरा भी कहा जाता था। ऋग्वेद में नदी के रूप में ही सरस्वती के प्रति श्रद्धा-निवेदन किया गया है। ऋग्वेद के नदी सूक्त के एक मंत्र में इस नदी को यमुना और सतलुज के बीच बहती हुई बताया गया है। तत्कालीन आर्य-सभ्यता के सारे गढ़, नगर और व्यावसायिक केंद्र सरस्वती के तट पर बसे थे। उस युग की शिक्षण संस्थाएं, ऋषियों की तपोभूमि और आचार्यों के आश्रम सरस्वती के तट पर ही स्थित थे। वेदों, उपनिषदों और अनेक स्मृति-ग्रंथों की रचना इन्हीं आश्रमों में हुई थी। सरस्वती को पवित्र नदी का दर्ज़ा हासिल था। ऋग्वेद के एक सूक्त के अनुसार - 'प्रवाहित होकर सरस्वती ने जलराशि ही उत्पन्न नहीं की, समस्त ज्ञान का भी जागरण किया है।' हजारों साल पहले सरस्वती में आई प्रलयंकारी बाढ़ से अधिकांश नगर और आश्रम नष्ट हो गए थे। तमाम प्राचीन ग्रंथों में इस भयंकर जलप्रलय की चर्चा आई है। सब कुछ नष्ट हो जाने के बाद आर्य सभ्यता धीरे-धीरे गंगा और जमुना के किनारों पर स्थानांतरित हो गई। सरस्वती तो विलुप्त हो गई, पर जनमानस में उसकी पवित्र स्मृतियां बची रहीं। प्रकृति की कल्याणकारी शक्तियों पर देवत्व आरोपित करने की हमारी सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप कालान्तर में ब्राह्मण ग्रंथों और पुराणों ने सरस्वती नदी को देवी का दर्जा दिया और उसकी महिमा बताने के लिए उसके इर्दगिर्द असंख्य मिथक खड़े किए।वसंतपंचमी का दिन हम देवी सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं। सरस्वती का सम्मान वस्तुतः आर्य सभ्यता-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, गीत-संगीत और धर्म-अध्यात्म के क्षेत्र में विलुप्त सरस्वती नदी की भूमिका के प्रति हमारी कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है। 

मित्रों को वसंत पंचमी और सरस्वती पूजा की बधाई और शुभकामनाएं !
#पूर्व आईपीएस ध्रुवगुप्त सर की वाल से।

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